लेखक के लिए खेल, पढ़ाई, भोजन और रामलीला अलग-अलग अनुभव नहीं बल्कि बचपन की एक जुड़ी हुई दुनिया हैं। गुल्ली-डंडा के प्रति लगाव से सरल और स्थानीय खेलों का भावनात्मक महत्व सामने आता है।
इस उप-विषय के तथ्य पाठ के दिए गए प्रसंग से ही समझे जा सकते हैं।
इस उप-विषय के तथ्य पाठ के दिए गए प्रसंग से ही समझे जा सकते हैं। निष्कर्ष वही रखें जो पाठ के प्रसंगों से स्पष्ट रूप से निकाला जा सकता है।
अभ्यास में अपने बचपन के खेलों से तुलना, चना-चबेना, खेलों के नाम, दिव्यांग मित्रों के साथ खेले जाने वाले खेल और प्राथमिक चिकित्सा पेटी पर कार्य हैं। पुस्तकालय में प्रेमचंद की कहानियाँ तथा मुरलीकांत पेटकर के जीवन के बारे में जानने का संदर्भ भी है।
इस उप-विषय के तथ्य पाठ के दिए गए प्रसंग से ही समझे जा सकते हैं।
इस उप-विषय के तथ्य पाठ के दिए गए प्रसंग से ही समझे जा सकते हैं। ये गतिविधियाँ पाठ की समझ को बातचीत, लेखन, भाषा-अभ्यास और रचनात्मक कार्य से जोड़ती हैं.