रामलीला के पात्रों की सजावट दोपहर से शुरू होती थी और लेखक पहले ही वहाँ पहुँच जाता था।
वह छोटे-मोटे काम उत्साह से करता था।
आगे वह गुल्ली-डंडा को अपना प्रिय खेल बताते हुए उसके सरल साधनों की चर्चा करता है। घटनाओं को उसी क्रम में देखें जिस क्रम में पाठ उन्हें प्रस्तुत करता है।
चबेना, पयाल, गुल्ली-डंडा, थापी, रामलीला और तमाशा जैसे शब्द पाठ के ग्रामीण तथा सांस्कृतिक जीवन को समझाते हैं। पाठ में दोपहर और अन्य शब्दों के अर्थ तथा संज्ञा-विशेषण से जुड़े अभ्यास भी हैं।
इस उप-विषय के तथ्य पाठ के दिए गए प्रसंग से ही समझे जा सकते हैं।
इस उप-विषय के तथ्य पाठ के दिए गए प्रसंग से ही समझे जा सकते हैं। शब्दों और भाषा-प्रयोग को उनके पाठ-संदर्भ के साथ समझना उपयोगी है।