गोल · Class 6 Hindi
Practise 10 short and long answer questions on गोल from गोल. Try writing your own answer first, then tap the question to compare it with the model answer and read the explanation behind it.
लेखक सन् 1933 में पंजाब रेजिमेंट की ओर से खेल रहे थे।
यह जानकारी मुकाबले के प्रसंग में स्पष्ट रूप से दी गई है।
माइनर्स टीम के खिलाड़ी लेखक से गेंद छीनने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन सफल नहीं हो पा रहे थे। इसी झुँझलाहट में एक खिलाड़ी ने गुस्से से लेखक के सिर पर हॉकी स्टिक मार दी।
घटना में असफलता के बाद खिलाड़ी का गुस्सा हिंसक व्यवहार में बदल गया।
लेखक को कुछ देर के लिए मैदान से बाहर ले जाया गया। बाद में वे सिर पर पट्टी बाँधकर फिर मैदान में पहुँचे और खेल जारी रखा।
वापसी लेखक के धैर्य और खेल के प्रति लगन को दिखाती है।
लेखक ने उसे चोट पहुँचाने के बजाय खेल में लगातार छह गोल किए। खेल के बाद उन्होंने उसे समझाया कि खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं होता।
लेखक ने बदले को हिंसा के बजाय खेल-कौशल और सीख देने का माध्यम बनाया।
लेखक सफलता के बड़े मंत्र लगन, साधना और खेल भावना को मानते हैं। वे किसी गुप्त मंत्र का दावा नहीं करते, बल्कि लगातार अभ्यास और सही दृष्टिकोण पर बल देते हैं।
यह विचार सफलता को अभ्यास और आचरण से जोड़ता है।
1936 के बर्लिन ओलंपिक में लोगों ने लेखक के हॉकी खेलने के ढंग को बहुत प्रभावशाली पाया। इसी कारण उन्हें “हॉकी का जादूगर” कहा जाने लगा।
उपाधि उनके खेल-कौशल के प्रति लोगों की प्रशंसा से जुड़ी है।
लेखक की कोशिश रहती थी कि गेंद गोल के पास पहुँचाकर किसी साथी खिलाड़ी को दे दें, ताकि गोल करने का श्रेय उसे भी मिले। वे जीत को केवल अपनी उपलब्धि नहीं मानते थे, बल्कि पूरी टीम और देश की जीत समझते थे।
टीम के साथी को अवसर देना सहयोग और सामूहिक सफलता की भावना दर्शाता है।
लेखक ने विरोधी खिलाड़ी से कहा कि खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं और उन्होंने खेल के माध्यम से अपना बदला ले लिया। खिलाड़ी अपने व्यवहार पर शर्मिंदा हुआ। इस प्रसंग से पता चलता है कि गलत व्यवहार करने वाला व्यक्ति प्रतिकार के डर में रह सकता है।
प्रसंग का संदेश हिंसा की जगह संयम और खेल भावना अपनाने का है।
लेखक पहले हॉकी में विशेष रुचि नहीं रखते थे। उनकी रेजिमेंट के सूबेदार मेजर तिवारी उन्हें बार-बार खेलने के लिए कहते थे और सैनिक जब चाहें अभ्यास करते थे। अभ्यास के साथ उनका खेल निखरता गया और उन्हें तरक्की भी मिली।
कथा बताती है कि रुचि और कौशल अभ्यास तथा अवसर से विकसित हो सकते हैं।
लेखक बर्लिन ओलंपिक में कप्तान बने और भारतीय टीम को स्वर्ण पदक मिला। वे मानते थे कि हार या जीत केवल उनकी नहीं, पूरे देश की होती है। इसलिए उनका खेल-कौशल व्यक्तिगत प्रसिद्धि से आगे बढ़कर राष्ट्रीय गौरव से जुड़ता है।
लेखक की दृष्टि में खिलाड़ी की सफलता देश और टीम के साथ साझा होती है।